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गणपति की सेवा मंगल मेवा

मोना खंडेलवाल
2017-09-08


गणेश भगवान की पूजा करने से बल-बुद्धि और रिद्धि-सिद्धि अर्थात् धन-धान्य की प्राप्ति होती है। साथ ही विघ्नहर्ता गणेश जी सारी बाधाओं को, सारी परेशानियों को पार लगा देते हैं।

विघ्नहर्ता, सिद्धिविनायक, मंगलमूर्ति, महाबली बुद्धि के दाता जिनका एक दांत है, जो मूसे की सवारी करते हैं, जिनकी दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि हैं, जिनका प्रिय भोजन मोदक है, उन सर्वज्ञाता श्री गणेश जी की उत्पत्ति के उपलक्ष्य में भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरंभ होकर चतुर्दशी तक बड़ी ही धूम-धाम से गणेश उत्सव मनाया जाता है। गणेश उत्सव वैसे तो पूरे भारत में ही मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र और अन्य तटीय क्षेत्रों में इसकी छटा देखते ही बनती है। वहां इसे बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। गणेश जी का यह उत्सव पूरे दस दिनों तक मनाया जाता है और ग्यारहवें दिन गणेश जी का विसर्जन किया जाता है। गणेश उत्सव का प्रारंभ दिन गणेश चतुर्थी और अंतिम दिन, यानी विसर्जन अनन्त चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी और गणेश चौथ के नाम से भी जाना जाता है।

शास्त्रों में देखें तो यह दिन गणेश जी का जन्म दिवस न होकर उनका पुनर्जन्म दिवस है। दरअसल एक बार जब शिवजी माता पार्वती से मिलने गए तो द्वार पर पहरा दे रहे बालक गणेश ने अपनी माता की आज्ञा के अनुसार उन्हें जाने से रोक दिया जिसके परिणामस्वरूप क्रोधित होकर भगवान शिव ने गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया, लेकिन जब शिवजी को पता चला कि वह स्वयं पार्वती पुत्र गणेश था तो माता पार्वती के विलाप करने पर उन्होंने हाथी का सिर काटकर उस बालक के धड़ पर लगा दिया जिससे वह फिर से जीवित हो गया। शास्त्रों के अनुसार वह दिन भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी था। इसी कारण यह दिन श्री गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं गणेश जी का यह पुनः अवतरण मध्याह्न काल में हुआ था इसलिए गणेश उत्सव के दौरान गणेश जी की पूजा व उनकी स्थापना के लिये यही समय उपयुक्त माना जाता है।

गणेश स्थापना-

गणेश उत्सव के पहले दिन खासकर कि महाराष्ट्र के प्रत्येक घर में गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। कहीं कहीं तो पूजा के लिये बड़े-बड़े पंडाल भी सजाये जाते हैं। सोसायटीज के लोग आपस में मिलकर सब तैयारियां करते हैं। ठीक उसी प्रकार जिस तरह कृष्ण जन्माष्टमी पर हांडी फोड़ प्रतियोगिता के लिये की जाती है। गणपति बप्पा की स्थापना के बाद पूरे दस दिनों तक गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करने के बाद ग्यारहवें दिन उनका विसर्जन किया जाता है। हालांकि सब लोग अपनी श्रद्धानुसार ही गणपति जी को घर लाते हैं। जैसे कुछ लोग डेढ़ दिन बाद ही विसर्जन कर देते हैं तो कुछ लोग तीसरे, पांचवें या सातवें दिन विसर्जन कर देते हैं। कई लोग गणेश जी की मूर्ति बाजार से न खरीद कर घर पर ही मिट्टी की मूर्ति बना लेते हैं और मूर्ति को कोरे कलश में जल भरकर, उस पर कोरा कपड़ा बांधकर स्थापित किया जाता है। उसके बाद गणेश जी पर सिन्दूर चढ़ाकर षोडशोपचार(सोलह सामग्रियां) से उनकी पूजा की जाती है और उनके प्रिय व्यंजन मोदक(लड्डूओं) का भोग लगाया जाता है। इसी तरह हर दिन सुबह-शाम गणेश जी की पूजा की जाती है। गणेश जी की पूजा के समय एक बात ध्यान देने की है उन्हें तुलसी पत्र कभी नहीं चढ़ाना चाहिए। इसके स्थान पर आप दूर्वा चढ़ा सकते हैं।

गणेश विसर्जन-

विसर्जन के दिन गणेश जी की मंगल आरती के साथ विधि-विधान से पूजा-पाठ के बाद एक स्वच्छ पाट लें। उसे गंगाजल से पवित्र करके उस पर घर की महिला स्वास्तिक बनाएं और उस पर अक्षत रखें। इसके बाद पाट पर एक साफ-सुथरा, सुंदर-सा लाल, गुलाबी या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर उसे फूलों की पंखुड़ियों से सजाएं और उसके चारों कोनों पर चार सुपारी रखें। अब गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित जगह से उठाकर पाट पर बिठा दें और उनके साथ फल-फूल, मिठाई, वस्त्र, दक्षिणा आदि रखकर गणपति बप्पा मोरया के जयघोष के साथ उस पाट को उठाकर विसर्जन के लिये किसी नदी, तालाब में विसर्जित कर दें। गणेश जी की विदाई के इस महोत्सव की तैयारी ठीक उसी तरह से की जाती है जिस तरह से किसी यात्री के जाते समय की जाती है। गणेश जी के साथ एक छोटी-सी लकड़ी पर गेहूं, चावल और पंच मेवाओं की पोटली बांधकर भी रखा जाता है। जिससे उन्हें राह में कोई बाधा न आयें। विसर्जन के दौरान गणपति जी की आरती के बाद उनकी बिदाई की जाती है और अगले साल उनके फिर से आने की कामना की जाती है।

 


Author : मोना खंडेलवाल
Published on : 2017-09-08

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मोना खंडेलवाल

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